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राई सरसों के उत्पादन में भूमि चयन का महत्व
सरसों की अधिकतम उपज के लिए ध्यान रखने योग्य बातें
सरसों के बीज का चयन एवं बुआई का समय
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सरसों की फसल के रोग व उनकी रोकथाम
प्रतिकूल परिस्थितियों में सरसों का रखरखाव :
कटाई के दौरान सरसों में हानि से बचाव
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प्रतिकूल परिस्थितियों में सरसों का रखरखाव :  

 

भारतवर्ष में सरसों मुख्य रूप से राजस्थान , हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि में उगाई जाती है. सरसों की फसल आमतौर पर बारानी फसल के रूप में उगाई जाती है. क्योंकि यह फसल पूरी तरह से वर्षा पर ही निर्भर है, इस कारण इससे जुडी समस्याए जन्म लेती हैं. जिनमे मुख्य रूप से सूखा, खारे पानी व मिटटी की समस्या, व उच्चतम तापमान की समस्याएँ हैं जोकि इस फसल को सामान्य रूप से उगने में बाधाएं पैदा करती है. इन समस्याओं का निदान निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है. 

सूखा : 
सरसों उगने वाले क्षेत्र इस फसल के लिए आमतौर पर बारिश पर निर्भर रहते हैं और कुछ क्षेत्रों में वारिश औसत से कम होने की वजह से जमीन नमी अधिक समय तक नहीं रख पाती, जिस कारण सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जोकि इस फसल के लिए अनुकूल नहीं होती. सरसों की बिजाई के समय इस स्थिति के कारण बीजों का अच्छा जमवार नहीं हो पाता और अगर हो भी जाये तो १० से १५ दिनों बाद पौधे मरना शुरू हो जाते हैं. सिंचाई से दिया गया पानी सरसों के उपयुक्त जमीन ज्यादा देर नमी नहीं रख पाता जिस कारण कुछ समय बाद पौधे कम नमी का शिकार हो जाते हैं. जिसका पूरा प्रभाव उसकी उत्पादकता पर पड़ता है. नमी की कमी का प्रभाव तेल की गुडवत्ता पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है. जिसके कारण सरसों की कीमत पर भी काफी असर पड़ता है. सूखे के कारण जब पौधा अची तरह से फल फूल नहीं पाता तब बिभिन्न प्रकार के कीट अवं बीमारिया उस पर अपना बुरा असर छोड़ते हैं. 

सूखे से निवारण : 
सूखा जो की मुख्य कारण है कम उत्पादकता, बीमारियों में वृद्धी व अवं अव्यवस्थित जमवार. सूखे से बचने क कुछ मुख्य उपाय इस प्रकार हैं. 
१. संतुलित मात्रा में NPKS देने के अतिरिक्त घरेलू उर्वरक (FYM) 10 T प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बीजाई से पहले यानी की तयारी के समय दाल देना चाहिए. अगर FYM उपलब्ध ना हो तो 2 - 3  T प्रति हेक्टेयर compost खाद डाली जा सकती है. इसके इस्तेमाल से जमीन में नमी ज्यादा देर तक रह सकती है. सूखे की स्थिति में उर्वरक का प्रयोग खण्डों में करना चाहिए. NPSK की एक तिहाई मात्रा बिजाई से पहले व दूसरी मात्रा पहले पानी के समय पर व तीसरी बची मात्रा दुसरे पानी के समय  देनी चाहिए. एसा करने से उर्वरक का पूरा पोषण पौधे को उपलब्ध हो जाता है. 
२. सरसों की फसल में आमतौर पर दो से तीन सिंचाई की जाती हैं लिकिन सूखे की स्थिति में पहली सिचाई २०-३० दिन बिजाई के बाद देनी चाहिए और दूसरी ५० - ६० दिन के बाद देनी चाहिए. अगर दूसरी सिंचाई से पहले हलकी वर्षा हो तो दूसरी सिचाई हलकी देनी चाहिए. कम मात्रा में उपलब्ध सिंचाई का पानी हो तो उस स्थिति में खेत में फुहार के रूप में सिंचाई की जानी चाहिए. 
३. सूखे की स्थिति में या जमीन में नमी की कमी की स्थिति में ऐसी सरसों की किस्मे उगाई जानी चाहिए जोकि कम समय में तैयार हो सकें. जैसे : RLM - 198 , RH - 781 , RH - 785 , RH - 30 , RH - 819 , Vardan . 

खारे पानी की समस्या : 
सरसों उगने वाले क्षेत्रों में सिंचाई के द्वारा जमीन में खारेपण की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. जिन क्षेत्रों में सालाना वर्षा औसत से कम होती है उन क्षेत्रों में सरसों उगने की लिए सिंचाई पर ही निर्भर रहना पड़ता है. जिस कारण सिंचाई के द्वारा इन जमीनों में खारेपन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. कुछ क्षेत्रों में सिचाई का पानी खारा न होने के कारण ऐसी स्तिथि उत्पन्न नहीं होती. ऐसा अनुमान लगाया गया ही की भारत में कुल उपजाऊ भूमि का १५% खारेपन की समस्या से ग्रसित है और ऐसा देखा गया है की राजस्थान के पचिमी जिलों में ८४% भूमिगत पानी खारा है जो की केवल सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. हरियाणा के कुछ जिलों में भी ये स्थिति पायी गयी है. इस स्थिति से होने वाली समस्याएँ इस प्रकार से हैं.
- बीजों का कम जमवार 
- अचानक  पौध का सूख जाना
- खारे पानी की फुहार से पौध की पत्तियों का ख़राब हो जाना. 

- पौधों का एक सामान न उगना. 
- अंत में उत्पादन में भारी कमी 

निवारण : 
खारे पानी का पहला असर सरसों की बिजाई से शुरू हो जाता है. इसलिए सरसों का खारे पानी से बचाव भी बिजाई से ही सुरु करना चाहिए. 
१. जिस खेत में खारे पानी से सिंचाई की जा रही हो उसमें २५ - ३० % ज्यादा बीज डालने चाहिए. इससे पौधों का विकास इस प्रकार हो जायेगा कि अगर कुछ बीज अंकुरित नहीं होते तो वो ज्यादा इस्तेमाल की गयी बीज दर के साथ तालमेल बिठा लेते हैं. 
२. जैसे कि पहले कहा गया है कि बीज दर २५-३०% ज्यादा डालनी चाहिए उसके साथ साथ सरसों के बीजों को २.५ से ३.० % तक CACL2 (केल्शियम कार्बोनेट) मिला लेना चाहिए जोकि बीज को खारे पानी में भी अंकुरित करने में सहायता करता है. जिन खेतों में खारे पानी से सिंचाई कि जा रही हो नाइट्रोजन कि मात्रा बदने से काफी अच्छा असर देखा गया है. जोकि १२० कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दिया जाना चाहिए. 
३. खारे पानी कि समस्या के कारण सिंचाई फुहार द्वारा या सामान्य सिंचाई खारेपन को पौधों कि जड़ के आस-पास छोड़ देती है इसीलिए सबसे अच्छी सिंचाई ड्रीप सिंचाई मानी गयी है. 

उच्च तापमान का असर व निवारण : 
उच्च ताप सहने वाली सरसों कि किस्में आमतोर पर अच्छी मानी जाती हैं. सरसों कि समय पर कि जाने वाली बिजाई यानी कि सितम्बर के आखिरी सप्ताह से अक्टूबर के पहले सप्ताह तक अच्छी प्रकार से जमीन में संरक्षित नमी का उपयोग कर पाते हैं. सही समय आर कि जाने वाली बिजाई फसल को पाले, Downy mildew एवं White Rust से बचा लेती है. यह फसल पकने से पहले उच्च ताप से बच जाती है. आमतोर पर देखा गया है कि तापमान जब ३२-३७ डिग्री तक पहुच जाता अहि तो इसका असर पौधे कि ऊंचाई पर तो पड़ता ही है साथ ही फूल आना भी कम हो जाता है. 

निवारण : 
अभी तक इस विषय पर कम प्रयोग किये गए हैं. फिर भी कुछ हद तक बचने के तरीके इस प्रकार हैं. 
१) सही समय पर कि जाने वाली बिजाई इस प्रकोप से बचा लेती है. 
२) जब पौधे बड़े हो जाए तो फुहार वाली सिंचाई इस प्रकोप से बचाने कि लिए ज्यादा बेहतर मानी गयी है. 
३) सिंचाई के लिए अगर पानी सामान्य से ज्यादा उपलब्ध हो तो फसल पकने से पहले एक हलकी सिंचाई कि जनि चाहिए. 
४) उच्च तापमान को सहने वाली किस्में हैं - RH ८१९, RH 8112 

 
 
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