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राई सरसों के उत्पादन में भूमि चयन का महत्व
सरसों की अधिकतम उपज के लिए ध्यान रखने योग्य बातें
सरसों के बीज का चयन एवं बुआई का समय
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सरसों के बीज का चयन एवं बुआई का समय  

 

भारत में अधिकतर किसान सरसों की पिछली फसल से प्राप्त बीजों को बुवाई के लिए इस्तेमाल करते हैं. ऐसा करने से कभी कभी सरसों की उत्पादकता में कमी आती है. क्योंकि पिछली फसल के बीजों में रोग के कीटाणु हो सकते हैं जो की नयी फसल में उभर आते हैं व घातक साबित होते हैं. इसलिए उत्तम प्रकार के बीजों का चयन व कीटाणु जनित बीजों का उपचार अत्यंत आवश्यक है. ऐसा देखा गया है कि सरसों में बीज जनित रोगों के कारण कभी कभी १०%-९०% व कभी-कभी पूरी फसल का नुकसान हो जाता है. 

बीज आकर में पूरे व बिना टूटे होने चाहिए. यदि किसान के पास छोटे व बड़े आकर के मिश्रित बीज हैं तो चान के एक ही आकर के बीजों का चयन करना चाहिए. मिश्रित बीजों के उपयोग से दो तरह के नुकसान हो सकते हैं, पहला छोटे और टूटे बीज कभी-कभी अंकुरित नहीं हो पाते व दूसरा मशीन द्वारा बीज खेत में डालने पर मशीन का छेद छोटा रखने पर बड़े आकर के बीज गिर नहीं पाते व बड़ा छेद रखने पर एक ही जगह कई गिर जायेंगे, इस तरह बुवाई के दौरान पूरे खेत में बीज रोपड़ एक सामान नहीं हो पायेगा. किसानो को फफूंदी लगे बीजों का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए. सरसों में होने वाली बीमारियाँ जैसे सफेद रतुआ, मिल्डयू, जड़ गलन एवं पौधे का सूखना आदि से बीज उपचार द्वारा फसल को बचाया जा सकता है. सफेद रतुआ एवं मिल्डयू के लिए बीजों को एस. डी.-३५ का उपचार ६ ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाना चाहिए क्योंकि ऐसा देखा गया है सफेद रतुआ के कारण लगभग ९०% तक कि दर से उत्पादन में हनी हो सकती है. जड़ गलन एवं पौधे का सूखना आदि रोग के लिए थाइरम २-३ ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीज में मिलाना चाहिए या कैप्टन, मैन्कोजेब ३-४ ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से मिलनी चाहिए. 

भारतवर्ष में सरसों रबी की फसल के रूप में बिभिन्न जलवायु में उगाई जाती है. जिसके कारण बुवाई का सही समय जगह के अनुसार बदलता रहता है. सही समय पर की जाने वाली बुवाई अच्छी फसल के लिए अति आवश्यक है. सरसों मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, असम एवं पंजाब में उगाई जाती है.

 
 
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