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राई सरसों के उत्पादन में भूमि चयन का महत्व
सरसों की अधिकतम उपज के लिए ध्यान रखने योग्य बातें
सरसों के बीज का चयन एवं बुआई का समय
कीट पतंगों का नियंत्रण
सरसों की फसल के रोग व उनकी रोकथाम
प्रतिकूल परिस्थितियों में सरसों का रखरखाव :
कटाई के दौरान सरसों में हानि से बचाव
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सरसों की अधिकतम उपज के लिए ध्यान रखने योग्य बातें  

 

देश का अधिकांश भाग इस वर्ष सूखे से प्रभावित रहा है. खरीफ की फसल या तो पूर्ण रूप से नष्ट हो गयी है या फिर अत्यधिक प्रभावित हुई है. खरीफ में हुए नुकसान की आंशिक भरपाई के लिए किसान भाई रबी की फसल, उपुक्त योजना बनाकर कर सकते हैं. सूखे का असर अधिकांशतः उन क्षेत्रों मे हुआ है जहा रबी मे सरसों बोई जाती है. अतः जो जमीन रिक्त रह गयी है उसको समय रहते तैयार करके सरसों व तोरिया की बिजाई की लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. यह एक ऐसी तिलहन फसल है जो कम पानी तथा बारानी क्षेत्रों मे पैदा की जा सकती है. सरसों की भरपूर उपज प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बातें ध्यान रखने यौग्य हैं:-

भूमि का चयन व तैयारी :

सरसों के लिए दोमट मिटटी व हलकी-रेतीली मिटटी उपयोगी होती है, हालाँकि यह चिकनी, हलकी रेतीली और यहाँ तक लावा मिटटी मे भी उगाई जा सकती है. अच्छे जल निकासी वाली भूमि इसके लिए उपुक्त होती है. अगर ऐसी व्यवस्था वाली भूमि है तो निचले धरातल वाली भूमि पर भी खेती की जा सकती है. भूमि का जल मग्न होना खेती के लिए हानिकारक है. सरसों के अन्कुरण के लिए भूमि की अच्छी तैयारी व नमी का संरक्षण अति आवश्यक है. बरसात के पानी को संरक्षित करके या पलेवा देकर नमी को बनाए रखा जा सकता है. करीब ६.० से ८.० पी. एच. वाली भूमि पैर उत्पादन हो सकता है. अधिक क्षारीय व अम्लीय भूमि, अंकुरण तथा पौधे विकास के लिए हानिकारक है.

बीज की मात्र, बुवाई का समय व विधि : 

जब औसत तापमान लगभग २५-२६ डिग्री सेल्सिअस आ जाये, तो यह समय सरसों की बुवाई के लिए उपुक्त होता है. यह तापमान उत्तर पश्चिम भारत में सामान्यतः अक्टूबर के द्वीतीय सप्ताह में होता है. तोरिया जो कम अवधी (९० दिन) की तिलहन फसल है प्रायः सितम्बर के पहले सप्ताह में बोते हैं. एसा करने से यह फसल चक्र में फिरसे आजाती है. बीज ४-५ किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से बोते हैं. मिटटी में अपर्याप्त नमी, बीज की दशा अच्छी न होने व उगने के उपरांत कीट व अन्य प्रकोपों को ध्यान में रखते हुए बीज की मात्रा उसी अनुसार बड़ाई जा सकती है. अच्छी पैदावार के लिए सरसों की शुद्ध खेती व कतारों में बोने की सिफारिश की गयी है. कतार से कतार की दूरी ३० से. मी. से ४० से. मी. की गहराई पर करते हैं.

खाद की मात्रा, देने का समय व विधि : 

लगभग ६०-७० कि. ग्रा.  नाइट्रोजन, ४० कि. ग्रा. फास्फोरस, ४० कि. ग्रा. पोटाश तथा ३०-४० कि. ग्रा. सल्फर प्रति हैक्टेयर कि आवश्यकता होती है. पूर्ण फोस्फोरस, पोटाश व आधी मात्रा नाइट्रोजन व सल्फर बिजाई से पहले बुवाई के लिए तैयार खेत में विखेर कर या हल से बोकर देते हैं. बाकी बचे नाइट्रोजन व सल्फर का आधा-आधा भाग पहली और दूसरी सिंचाई के बाद देने से पौधे का विकास, फलाव व दाने का भराव अच्छा होता है. रासायनिक खादों में यूरिया तीव्र घुलनशील है अतः इसका प्रयोग कड़ी फसल पर ज्यादा लाभदायक है. जहाँ आणि उपलब्ध नहीं है, वहाँ शीतकालीन वर्षा का लाभ उठाकर नाइट्रोजन व सल्फर दे देती हैं. अगर वर्षा का आभाव है तो यूरिया का २.५ % घोल छिड़कते हैं.  ध्यान रहे कि घोल में यूरिया कि मात्रा ज्यादा होने से पत्तियां जल सकती हैं और फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. अगर कीट, फफूंदी का प्रकोप है तो घोल में कीट व फफूदीनाशक रसायनों को मिलकर छिड़कने से एक साथ कई काम हो जाते हैं और साथ ही समय कि बचत होती है. अगर हरी खाद, या गोबर कि खाद पहले दी जा चुकी है तो रासायनिक खादों कि मात्रा में कुछ कटौती कर सकते हैं.

फसल कि छटाई : 

अच्छे उत्पादन के लिए पौधों का पर्याप्त घनत्व आवश्यक है. एक हैक्टेयर में २,५०,००० पोधों के हिसाब से एक वर्ग मीटर में लगभग २५ पौधे होने चाहिए. अगर पौधे ज्यादा हैं तो उपुक्त संख्या रखने के लिए छटाई (अनावश्यक पौधे उखाड़ना) बिजाई के २५-३० दिन बाद करते हैं. पौधे से  पौधे की दूरी करीब १० से. मी. रखते हैं.  ध्यान रहे कि पौधों का घनत्व कम होने से उपज कम हो जाती है. 

खरपतवार नियंत्रण : 


प्रारंभिक अवस्था में अगर खरपतवार न नष्ट किये जाए तो फसल पर प्रतिकूल प्रवाभ पड़ता है. गर्मियों में अच्छी तरह गहरी जुताई करने से मिटटी में पलने वाले कीट, खरपतवार के बीज, फफूंदी व अन्य हानि पहुचने वाले परजीवी नष्ट या कम हो जाते हैं. अगर खरपतवार उग आये हैं तो हाथों, कृषि यंत्रों व खरपतवारनाशी रसायनों से नियंत्रण करते हैं. "बासालिन" नामक खरपतवारनाशी रसायन का घोल  का फसल बोने से पहले  उचित नमी वाले बिजाई के लिए तैयार खेत में १.० से १.५ लीटर प्रति हैक्टेयर कि दर से छिडकने के बाद डिस्क द्वारा मिटटी में मिश्रित करने से अधिकतम खरपतवार नष्ट हो जाते हैं. रसायनों का उपयोग उचित मात्रा में ही करें.

मुख्य कीट व उनकी रोकथाम :

प्रारम्भिक अवस्था में चित्तीदार कीड़ा (बग्राड़ा) व आरामक्खी मुख्य कीट हैं. अतः अन्कुरण के तुरंत बाद ध्यान रहे कि जैसे चित्तीदार कीड़ा नजर आये ४% इन्डोसल्फान कि धूल का भुरकाव करें या फोरेट-१० जी ग्रेन्यूल जमीन में सिचाई के बाद प्रयोग करें. फूल आते समय या उसके बाद कि अवस्था में प्रायः चैंपा कीट का प्रकोप होता है. यह फसलनाशी कीटों में गंभीर है और अगर समय से उपाय नहीं किये गए तो नुकसान अत्यधिक हो जाता है. अतः इसके नियंत्रण के लिए मेटासिस्टाम (२५ ई. सी.) या रोगर (३० ई. सी.) का १% घोल (१ मि. ली. प्रति लीटर की दर से) का फसल पर छिडकाव (६०० लीटर प्रति हक्टेयर) करें. 

मुख्य बीमारियाँ व उनका नियंत्रण : 

काले धब्बे वाले झुलसा व सफ़ेद रतुआ तथा डाउनीमिल्डयू  आदि कुछ अधिक हानिकरक फफूंदी रोग हैं. इनमे झुलसा रोग अत्यधिक हानिकारक है और इसके लिए अभी तक कोई संतोषजनक रोगरोधी सरसों कि किस्में नहीं है.  झुलसा रोग के मुख्य लक्षण हैं पहले पत्तियों पर गोलाकार काले धब्बे बनना तथा बाद में ताने, शाखाओं व फलियों पर फैल जाना. सफ़ेद रतुआ नमक रोग भी पहले पत्तियों  पर सफ़ेद पाउडर युक्त गोलाकार धब्बे, बाद में शाखाओं व ऊपरी फलियों में विकृति से पहिचाना जा सकता है.  डाउनीमिल्डयू के लक्षण भी सफेद रतुआ से मिलते जुलते हैं. इन बीमारियों की रोकथाम के लिए रिड्रोमिल एम. जेड. (०.२५%) बिजाई के २५-३० दिन के बाद तथा ७०-९० दिन बाद मैन्कोजब (०.२% घोल) का छिडकाव करें. अगर फफूंदी का प्रकोप ज्यादा हो तो थोड़े अन्तराल के बाद दूसरा छिडकाव करें. डाइथेन एम - ४५ के घोल (२.० ग्रा. पाउडर प्रति लीटर पानी की दर से) का छिडकाव भी सभी बिमारियों के नियंत्रण में लाभिदायक है. सफेद रतुआ और  डाउनीमिल्डयू   रोधी किस्में भी विकसित की गयी हैं. जहाँ बीमारी ज्यादा आती है, ऐसे किस्मों का चयन करें.

 
 
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